प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए इसे “बेहद गंभीर मामला” करार दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि केंद्रीय एजेंसियों की जांच में राज्य एजेंसियों के कथित हस्तक्षेप से कानून-व्यवस्था और संवैधानिक संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि यदि इस तरह के मामलों की समय पर जांच नहीं हुई, तो इससे राज्यों में “अराजकता जैसी स्थिति” पैदा हो सकती है। अदालत ने कहा कि कानून के शासन को बनाए रखने और सभी संस्थाओं को स्वतंत्र रूप से काम करने देने के लिए इस मुद्दे की गहन समीक्षा आवश्यक है।
किन्हें जारी हुआ नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राज्य के डीजीपी राजीव कुमार, कोलकाता पुलिस कमिश्नर मनोज कुमार वर्मा और साउथ कोलकाता के डिप्टी कमिश्नर प्रियब्रता रॉय को नोटिस जारी किया है। सभी से दो सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है। अगली सुनवाई 3 फरवरी को होगी।
FIR पर रोक, CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश
अदालत ने पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज तीन एफआईआर की आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। साथ ही निर्देश दिया है कि 8 जनवरी को I-PAC कार्यालय में हुई तलाशी से जुड़े सभी CCTV फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएं।
ED का आरोप: जांच में जानबूझकर बाधा
ED की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि यह मामला एक “चिंताजनक पैटर्न” को दर्शाता है, जहां पहले भी केंद्रीय एजेंसियों के काम में हस्तक्षेप किया गया है। उनका आरोप है कि PMLA की धारा 17 के तहत तलाशी के दौरान मुख्यमंत्री, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और बड़ी संख्या में पुलिस बल ने कार्यालय में प्रवेश कर फाइलें और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस अपने कब्जे में ले लीं।ED का यह भी कहना है कि कानून के तहत राज्य पुलिस का दायित्व था कि वह केंद्रीय एजेंसी की सहायता करे, लेकिन इसके उलट जांच को बाधित किया गया। एजेंसी ने इस पूरे मामले की CBI से जांच कराने की मांग की है।
ममता बनर्जी की ओर से आपत्ति
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने याचिका की सुनवाई योग्य होने पर सवाल उठाया। उन्होंने दलील दी कि मामला हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। सिब्बल ने कहा कि I-PAC तृणमूल कांग्रेस का चुनावी सलाहकार है और वहां पार्टी से जुड़ा गोपनीय डेटा मौजूद था, जिसकी सुरक्षा के लिए मुख्यमंत्री वहां गई थीं।उनका दावा है कि ED द्वारा लगाए गए आरोप तथ्यहीन हैं और वीडियो फुटेज से यह स्पष्ट हो जाएगा कि कोई अवैध कार्य नहीं हुआ।
राज्य सरकार का पक्ष पश्चिम बंगाल सरकार और डीजीपी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका की वैधता पर आपत्ति जताई और इसे “फोरम शॉपिंग” बताया। उन्होंने कहा कि तलाशी के दौरान किसी प्रकार की अव्यवस्था नहीं हुई और पंचनामा में भी यही दर्ज है।
अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कहा कि केंद्रीय जांच एजेंसियों के काम में इस तरह का हस्तक्षेप अगर सही पाया गया, तो यह संवैधानिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत होगा। अदालत ने जोर दिया कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए, चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो।
सारस न्यूज़, वेब डेस्क।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए इसे “बेहद गंभीर मामला” करार दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि केंद्रीय एजेंसियों की जांच में राज्य एजेंसियों के कथित हस्तक्षेप से कानून-व्यवस्था और संवैधानिक संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि यदि इस तरह के मामलों की समय पर जांच नहीं हुई, तो इससे राज्यों में “अराजकता जैसी स्थिति” पैदा हो सकती है। अदालत ने कहा कि कानून के शासन को बनाए रखने और सभी संस्थाओं को स्वतंत्र रूप से काम करने देने के लिए इस मुद्दे की गहन समीक्षा आवश्यक है।
किन्हें जारी हुआ नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राज्य के डीजीपी राजीव कुमार, कोलकाता पुलिस कमिश्नर मनोज कुमार वर्मा और साउथ कोलकाता के डिप्टी कमिश्नर प्रियब्रता रॉय को नोटिस जारी किया है। सभी से दो सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है। अगली सुनवाई 3 फरवरी को होगी।
FIR पर रोक, CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश
अदालत ने पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज तीन एफआईआर की आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। साथ ही निर्देश दिया है कि 8 जनवरी को I-PAC कार्यालय में हुई तलाशी से जुड़े सभी CCTV फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएं।
ED का आरोप: जांच में जानबूझकर बाधा
ED की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि यह मामला एक “चिंताजनक पैटर्न” को दर्शाता है, जहां पहले भी केंद्रीय एजेंसियों के काम में हस्तक्षेप किया गया है। उनका आरोप है कि PMLA की धारा 17 के तहत तलाशी के दौरान मुख्यमंत्री, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और बड़ी संख्या में पुलिस बल ने कार्यालय में प्रवेश कर फाइलें और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस अपने कब्जे में ले लीं।ED का यह भी कहना है कि कानून के तहत राज्य पुलिस का दायित्व था कि वह केंद्रीय एजेंसी की सहायता करे, लेकिन इसके उलट जांच को बाधित किया गया। एजेंसी ने इस पूरे मामले की CBI से जांच कराने की मांग की है।
ममता बनर्जी की ओर से आपत्ति
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने याचिका की सुनवाई योग्य होने पर सवाल उठाया। उन्होंने दलील दी कि मामला हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। सिब्बल ने कहा कि I-PAC तृणमूल कांग्रेस का चुनावी सलाहकार है और वहां पार्टी से जुड़ा गोपनीय डेटा मौजूद था, जिसकी सुरक्षा के लिए मुख्यमंत्री वहां गई थीं।उनका दावा है कि ED द्वारा लगाए गए आरोप तथ्यहीन हैं और वीडियो फुटेज से यह स्पष्ट हो जाएगा कि कोई अवैध कार्य नहीं हुआ।
राज्य सरकार का पक्ष पश्चिम बंगाल सरकार और डीजीपी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका की वैधता पर आपत्ति जताई और इसे “फोरम शॉपिंग” बताया। उन्होंने कहा कि तलाशी के दौरान किसी प्रकार की अव्यवस्था नहीं हुई और पंचनामा में भी यही दर्ज है।
अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कहा कि केंद्रीय जांच एजेंसियों के काम में इस तरह का हस्तक्षेप अगर सही पाया गया, तो यह संवैधानिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत होगा। अदालत ने जोर दिया कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए, चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो।
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