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सम्मानजनक देखभाल से प्रणालीगत विश्वास तक: गाछपाड़ा हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की एक सफलता कथा।

जब प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा विकल्प नहीं, आधार बनती है

राहुल कुमार, सारस न्यूज़, किशनगंज।

भारत की प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सेवाओं की उपलब्धता नहीं, बल्कि उन पर समुदाय का भरोसा स्थापित करना है। विशेषकर ग्रामीण और सीमावर्ती जिलों में यह भरोसा तभी बनता है, जब स्वास्थ्य केंद्र योजनाओं और अभियानों से आगे बढ़कर लोगों की दैनिक जरूरतों का हिस्सा बनें। जिले का गाछपाड़ा हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर इसी दिशा में एक व्यवहारिक और प्रमाणित उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं ने धीरे-धीरे लोगों के जीवन में स्थायी जगह बनाई है।

सीमित उपयोग और स्वास्थ्य सेवाओं से दूरी

दिसंबर 2023 तक गाछपाड़ा हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर की स्थिति भी देश के कई ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों जैसी थी। ओपीडी संख्या 359 तक सीमित थी और अधिकांश लोग मामूली बीमारियों, गैर-संचारी रोगों तथा गर्भावस्था संबंधी जांचों के लिए भी दूरस्थ अस्पतालों या निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर थे। समय, खर्च और असुविधा के कारण उपचार में निरंतरता नहीं बन पाती थी, जिसका असर सीधे स्वास्थ्य परिणामों पर पड़ता था।

इस स्थिति को बदलने में कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर (सीएचओ) राकेश बर्मन की भूमिका निर्णायक रही। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को केवल ओपीडी तक सीमित न रखते हुए निरंतर देखभाल, सामुदायिक संवाद और स्वास्थ्य साक्षरता को सेवा का अभिन्न हिस्सा बनाया। नियमित गांव भ्रमण, बैठकों में सहभागिता, घर-घर संपर्क और सरल भाषा में परामर्श के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों की दिनचर्या से जोड़ा गया।

सेवा उपयोग में बदलाव: आंकड़ों में दिखती सफलता

इन प्रयासों का प्रभाव स्पष्ट रूप से सेवा उपयोग में दिखाई दिया। दिसंबर 2023 में 359 ओपीडी से बढ़कर नवंबर 2025 तक ओपीडी संख्या 14,330 तक पहुंच गई। यह वृद्धि केवल संख्या नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि लोग अब स्वास्थ्य केंद्र को अपनी नियमित स्वास्थ्य आवश्यकताओं के लिए भरोसेमंद मानने लगे हैं। उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे गैर-संचारी रोगों में नियमित फॉलो-अप और दवा अनुपालन में भी सुधार दर्ज किया गया है।

लाभार्थियों के अनुभव इस बदलाव की सशक्त पुष्टि करते हैं।
गांव के निवासी मोहम्मद अली (45 वर्ष), जो उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं, बताते हैं, “पहले दवा बीच में छोड़ देता था। अब हर बार समझाया जाता है कि दवा क्यों जरूरी है, इसलिए नियमित लेता हूँ।”
इसी तरह 62 वर्षीय शांति देवी कहती हैं, “अब छोटी बीमारी में शहर नहीं जाना पड़ता। यहीं जांच और दवा मिल जाती है।”
युवाओं में भी स्वास्थ्य केंद्र को लेकर भरोसा बढ़ा है। 22 वर्षीय इरफान आलम बताते हैं, “अब हम लोग खुद कहते हैं कि शुगर या बीपी जांच रखिए, हम सब आएंगे।”

मातृत्व सेवाओं में सुधार: सम्मानजनक देखभाल का प्रभाव

मातृत्व सेवाओं के क्षेत्र में भी गाछपाड़ा हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर ने उल्लेखनीय प्रगति की है। आशा कार्यकर्ता अम्बेरा खातून बताती हैं कि पहले महिलाएं दूरी और व्यवहार के डर से जांच टाल देती थीं। अब वे समय पर जांच के लिए आती हैं। जनवरी 2025 से नवंबर 2025 तक 1053 एएनसी जांचों का संपादन इस बदलाव का ठोस प्रमाण है। नजदीकी सेवा, नियमित निगरानी और सम्मानजनक व्यवहार ने मातृत्व देखभाल को अधिक सुलभ और स्वीकार्य बनाया है।

संस्थागत दृष्टिकोण: प्रशासन की मान्यता

सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी कहते हैं कि जब मरीज स्वास्थ्य केंद्र को अपना समझने लगते हैं, तभी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावी होती हैं। गाछपाड़ा में यह बदलाव सीएचओ के निरंतर प्रयास और व्यवहारिक दृष्टिकोण का परिणाम है।

सेवाओं की गुणवत्ता, रिकॉर्ड प्रबंधन और मरीज-केंद्रित कार्यप्रणाली के आधार पर गाछपाड़ा हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर को राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (NQAS) प्रमाणन प्राप्त हुआ। यह उपलब्धि उस कार्यशैली की पुष्टि है, जिसमें अनुशासन, निरंतरता और मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी गई।

स्थानीय प्रयास, राष्ट्रीय सीख

गाछपाड़ा हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर की यह सफलता कथा स्पष्ट करती है कि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में स्थायी सुधार बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि नेतृत्व, निरंतर संवाद और समुदाय के विश्वास से संभव होता है। यह कहानी दर्शाती है कि जब सीएचओ स्वास्थ्य कर्मी से आगे बढ़कर समुदाय और व्यवस्था के बीच सेतु बनता है, तब एक छोटा सा स्वास्थ्य केंद्र भी राष्ट्रीय स्तर पर अनुकरणीय मॉडल बन सकता है।

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