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बिंदु अग्रवाल की कविता # 27 (मेरी बिटिया)

विजय गुप्ता, सारस न्यूज, गलगलिया।

मेरी बिटिया
देख के उसके मुखड़े को,
दिल बाग-बाग हो जाता है।

उस मधुर मिलन की बेला का,
सुखद एहसास हो जाता है।

जब आई मेरी गोद मे बिटिया,
छोटी-छोटी पलके थी बन्द,

निहार उसे नैना मेरे,
मुस्कुरा रहे थे मन्द-मन्द।

खुले आँगन में विचरण करती,
मस्त परी सी वह स्वच्छन्द।

पल-पल लख-लख पुलकित होता,
भाव विभोर मेरा अंतर मन।

छोटे-छोटे अधरों से वह,
चुम्बन मेरा करती है,
नन्हे-नन्हे हाथो से ,
अपनी बाहों में भरती है।

स्वर्ग कही गर है तो,
बिटिया की आखों में देखा है,

बेटी की मुस्कान के आगे,
दुनिया का हर सुख फीका है।
स्वरचित

         बिंदु अग्रवाल 
         गलगलिया

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