विजय कुमार गुप्ता, सारस न्यूज, गलगलिया।
तेरी गलियों से
तेरी गलियों से जबसे गुजरने लगे हैं हम,
तबसे कुछ इस कदर निखरने लगे हैं हम।
ना जाने क्यों पाने को एक झलक तेरी,
रास्ते अपने अब बदलने लगे हैं हम।
धड़कने बढ़ने लगी है अब, नाम तेरा सुनकर,
गुस्ताखियां इस दिल की अब, समझने लगे हैं हम।
नागवांर था हमे जिस छांव में बैठना,
उस पेड़ के नीचे कुछ देर, ठहरने लगे हैं हम।
कहीं समझ ना जाओ हमारी ,बेताबी को तुम
सबसे नज़रें बचा कर तुम्हें देखने लगे हैं हम।
कुछ तो बात होगी चाहत में तुम्हारी,
क्यों तुम्हें देख आहें भरने लगे हैं हम?
अनजान रहे हम तुम्हारी पसंद ना पसंद से,
इसलिए अब आदतें अपनी बदलने लगे हैं हम।
कहीं तुम्हें भी न हो जाए मोहब्बत हमसे,
यही सोच कर अब संवरने लगे हैं हम।
बिंदु अग्रवाल
किशनगंज, बिहार
