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गर्भावस्था के दौरान अनियंत्रित शुगर बनता है जेस्टेशनल डायबिटीज की वजह।

सारस न्यूज़, राहुल कुमार, किशनगंज।

जीवनशैली से जुड़ी बीमारी डायबिटीज आज लोगों की सेहत को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। हर उम्र के लोग इसका शिकार हो रहे हैं। अनियंत्रित शुगर की वजह से हम कई गंभीर व जानलेवा बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। जीवनशैली जनित जिस बीमारी ने पिछले कुछ समय में सबसे तेजी से हमारे देश में पैर पसारे हैं, उनमें डायबिटीज का नाम सबसे ऊपर है। अब तो उम्र, वर्ग भी इसका मापदण्ड नहीं रह गया। किसी को भी यह बीमारी चपेट में आसानी से ले सकती है। उससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि शरीर में शकर के असन्तुलन से अन्य कई गम्भीर और जानलेवा बीमारियों का हमला भी आसान हो जाता है। वहीं गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज से जुड़ी चुनौतियां भी तेजी से बढ़ रही है। अनियंत्रित शुगर ना सिर्फ प्रसव में अड़चने पैदा करता है बल्कि मां व बच्चा दोनों के लिये जानलेवा पस्थितियां पैदा कर सकता है। लिहाजा गर्भावस्था के दौरान ब्लड शुगर के स्तर को लेकर अधिक सतर्क रहने की जरूरत होती है।

अनियंत्रित सुगर से बढ़ जाती है प्रसव संबंधी जटिलता
सिविल सर्जन डॉ राजेश कुमार ने बताया कि डायबिटीज का एक खतरनाक स्वरूप गर्भावस्था के दौरान भी सामने आता है। जहां अनियंत्रित शुगर न केवल प्रसव में अड़चन पैदा कर सकती है बल्कि मां और बच्चे दोनों के लिए जानलेवा स्थितियां भी बना सकती है। इसलिए जरूरी है कि इस दौरान भी शुगर के स्तर को लेकर सतर्क रहा जाए। गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिलाओं के तेजी से हार्मोनल बदलवा होता है। इसके साथ तालमेल बिठाना हमारे शरीर के लिये आसान नहीं होता। ऐसे में अगर रक्त में शुगर का स्तर असंतुलित हो तो ये जटिल परिस्थिति पैदा कर सकता है। गर्भावस्था के दौरान टाइप-1 व टाइप-2 डायबिटीज के अलावा एक खास प्रकार के डायबिटीज का खतरा होता है। इसे जेस्टेशनल डायबिटीज के नाम से जाना जाता है। ये खासतौर पर गर्भावस्था के दौरान शरीर में शुगर के स्तर के असंतुलन से जुड़ा होता है। कई मायनों में टाइप-1 व टाइप-2 डायबिटीज से अलग होता है। अधिकांश मामलों में प्रसव के उपरांत शुगर का स्तर सामान्य हो जाता है। लेकिन एक बार जेस्टेशनल डायबिटीज होना टाइप-2 डायबिटीज की आशंका को बढ़ा सकता है।


जच्चा-बच्चा की सेहत पर पड़ता प्रतिकुल प्रभाव

गैर संचारी रोग पदाधिकारी डॉ उर्मिला कुमारी ने बताया कि गर्भावस्था के समय डायबिटीज का सामने आना या इसका पहले से शरीर में मौजूद रहना दोनों ही स्थितियां जच्चा-बच्चा की सेहत को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। इसके कारण बच्चे में जन्मजात विकार की आशंका होती है। वहीं प्राव के दौरान नवजात की मौत, प्रसव प्रक्रिया का बाधित होना, गर्भपात, समय पूर्व बच्चे का जन्म सहित इस कारण अन्य जटिलताएं हो सकती हैं। इतना ही नहीं बचपन व किशोरावस्था में ऐसे बच्चों में मोटापा की आशंका होती है वहीं बड़े होने पर टाइप-2 डायबिटीज की संभावना भी इन बच्चों में अधिक होती है।गर्भवती माताए अपने निकटवर्ती हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर में जाकर निशुल्क डायबिटीज जांच करवा सकते है |

संतुलित खान-पान व स्वस्थ जीवनशैली जरूरी

सदर अस्पताल उपाधीक्षक डॉ अनवर हुसैन ने बताया की गर्भावस्था के शुरूआती दौर से ही डायबिटीज का प्रबंधन जरूरी होता है। डायबिटीक महिला के लिये ये जरूरी है कि डायबिटीज पूरी तरह नियंत्रित होने पर भी गर्भधारण की योजना बनायें। महिलाएं शुरू से ही अपने वजन, खान-पान व शारीरिक गतिविधियों को लेकर सजग रहें। प्री डायबिटीज की शिकार महिलाओं के लिये नियमित दवा का सेवन, संतुलित, खान-पान व जीवनशैली में साकारात्मक बदलाव जरूरी होता है। नियमित रूप से अपने डायबिटीज की जांच करायें। भोजन में ताजी पत्तेदार सब्जी, फल व फाइबर की मात्रा अधिक शामिल करें। मीठी चीजों का कम सेवन व अधिक पानी का पीयें। चिकित्सकों की सलाह पर नियमित रूप से फॉलिक एसिड सप्लीमेंट का प्रयोग करें।

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