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खोरीबाड़ी में फर्जी जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र के बाद अब उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र का मामला गरमाया।

सारस न्यूज़, सिलीगुड़ी।


खोरीबाड़ी ग्रामीण अस्पताल में फर्जी जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने के विवाद के बीच अब धोखाधड़ी का एक नया मामला सामने आया है। इस बार रानीगंज-पानीशाली ग्राम पंचायत क्षेत्र में फर्जी उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र (Heir Certificate) का मुद्दा गरमा गया है।

कथित तौर पर पंचायत की मंजूरी के बिना, कई सदस्यों के हस्ताक्षर के आधार पर फर्जी प्रमाण पत्र तैयार किया गया था। श्यामधन जोत निवासी सुभाष मंडल ने आरोप लगाया है कि पश्चिम बदरा जोत निवासी रेखा सरकार और जमातुल्ला जोत निवासी माया मंडल नामक दो महिलाओं ने उनके दिवंगत पिता दशरथ मंडल के नाम का दुरुपयोग कर खुद को उनका “उत्तराधिकारी” बताकर प्रमाण पत्र हासिल कर लिया।

सुभाष मंडल का कहना है कि मई 2023 में दोनों महिलाओं ने उनकी पैतृक संपत्ति हड़पने की नीयत से उनके पिता के नाम का इस्तेमाल करते हुए रानीगंज-पानीशाली ग्राम पंचायत से फर्जी प्रमाण पत्र बनवाया। शिकायत मिलने के बाद पंचायत प्रधान संतना सिंह ने शुक्रवार को आरोपितों को तलब किया, लेकिन वे पेश नहीं हुए।

इस बीच, जमातुल्ला ग्राम पंचायत की सदस्य सुष्मिता मंडल ने कहा कि उन्होंने प्रमाण पत्र जारी करने की सिफारिश इसलिए की थी क्योंकि आरोपित उसी इलाके की निवासी हैं। उन्होंने कुछ दस्तावेज़ और हलफ़नामे भी प्रस्तुत किए। सुष्मिता ने बताया, “जब मैंने देखा कि उनके पिता की मृत्यु को लगभग 40 वर्ष बीत चुके हैं, तो मैंने ज्यादा जांच नहीं की और प्रधान से प्रमाण पत्र जारी करने की सिफारिश कर दी।”

हालांकि, जब उन्होंने आरोपित रेखा और माया से संपर्क करने की कोशिश की तो वे दोनों उपलब्ध नहीं हुईं। उनके घर जाने पर भी वे नहीं मिलीं।

स्थानीय लोगों ने सवाल उठाया है कि “अगर पंचायत में ही ऐसे फर्जी प्रमाण पत्र बनाए जाएंगे, तो आम लोग न्याय के लिए कहां जाएंगे?” इस घटना से क्षेत्र में आक्रोश फैल गया है और प्रशासनिक स्तर पर जांच की मांग तेज हो गई है।

रानीगंज-पानीशाली ग्राम पंचायत की प्रधान संतना सिंह ने कहा, “अगर आरोपित बुधवार तक पेश नहीं होते हैं, तो कानूनी कार्रवाई के माध्यम से प्रमाण पत्र रद्द कर दिया जाएगा।”

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सदस्य सुष्मिता मंडल की सिफारिश पर ही प्रमाण पत्र जारी किया गया था। प्रधान ने बताया कि बोर्ड की बैठक में यह तय किया गया था कि आवेदक के दस्तावेज़ों और जानकारी की ज़मीनी जांच के बाद ही प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा, लेकिन इस मामले में उस नियम का पालन नहीं किया गया।

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