सारस न्यूज़, वेब डेस्क।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी नहीं थोपी जा सकती। अदालत ने एक बुजुर्ग दंपती द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि नैतिक जिम्मेदारी को कानून के जरिए लागू नहीं किया जा सकता।
मामला उस समय सामने आया जब एक बुजुर्ग दंपती ने अपने बेटे की मृत्यु के बाद अपनी बहू से मेंटेनेंस यानी भरण-पोषण की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। दंपती का कहना था कि बेटे के निधन के बाद उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई है और बहू को उनकी देखभाल की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि परिवार में नैतिक जिम्मेदारियां जरूर होती हैं, लेकिन हर नैतिक दायित्व को कानूनी दायित्व नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि मौजूदा कानून में बहू को सास-ससुर के भरण-पोषण के लिए बाध्य करने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, विशेषकर तब जब पति का निधन हो चुका हो।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यदि किसी व्यक्ति पर कानूनन जिम्मेदारी तय नहीं है, तो केवल नैतिक आधार पर उसे बाध्य नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने बुजुर्ग दंपती की याचिका खारिज कर दी।
यह फैसला पारिवारिक अधिकारों और कानूनी जिम्मेदारियों की सीमा को स्पष्ट करने वाला माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस निर्णय से ऐसे मामलों में भविष्य की सुनवाई के लिए एक स्पष्ट दृष्टिकोण सामने आया है।
