सारस न्यूज, किशनगंज।
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। जी हां, इंसान जानलेवा बीमारी से तय वक्त में मरता है, लेकिन बीमारी का खौफ उसे पल-पल मौत देता है। ऐसी ही जानलेवा बीमारी है कैंसर, जिसका खौफ इंसान को अंदर तक झिझोड़ देता है। अधिकांश मरीज कैंसर का पता चलने पर जिंदगी को खत्म मान लेते हैं, लेकिन यह सच नहीं है। इस मिथक को धता बता रही हैं नीलम कुमारी। जिंदादिल महिला होने के साथ उनके चेहरे पर आत्मविश्वास, स्वाभिमान और खुशहाली की दमक है। 57 वर्षीय नीलम कुमारी ने न केवल स्तन कैंसर की बीमारी को मात दी, बल्कि बहुत से कैंसर मरीजों के लिए वह प्रेरणास्त्रोत भी हो गई हैं जो कैंसर जैसी घातक बीमारी के पीड़ित हैं। नीलम कुमारी प्रेरणादायी संघर्षों की कहानी को जन-जन तक पहुंचाना चाहती हैं।
नीलम पेशे से एक एएनएम हैं और वह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ठाकुरगंज में गत 4 वर्षो से कार्यरत हैं। नीलम कुमारी ने जीवन के प्रति उनका नजरिया बदलने और उनके पेशे में शामिल लोगों की स्वास्थ्य सेवा को और भी समर्पित रूप से करने के लिए कैंसर के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा मुझे मेरे जीवन में आने के लिए कैंसर को धन्यवाद देना होगा क्योंकि इसने मेरा नजरिया पूरी तरह बदल दिया और मैं अब ज्यादा दयालु हो गई हूं और मेरा नजरिया पहले से व्यापक हो गया है। मैं एक एएनएम हूं तो मेरी स्वास्थ्य सेवाएं देने के प्रति मेरे नजरिए में काफी सकारात्मक बदलाव आया है। नीलम ने कहा कि मैं कैंसर की शुक्रगुजार इसलिए हूं क्योंकि मैं एक विजेता हूं। मैं इससे गुजर रहे कई लोगों के लिए जीत का चेहरा हूं।
नीलम का बचपन उसके पैतृक गांव लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा सलेमपुर में बीता। वहां उनकी प्रारंभिक पढ़ाई पूरी हुई। नीलम ने नर्सिंग की पढ़ाई एएनएम नर्सिंग स्कूल मुंगेर से पूरी की। वर्ष 2007 में सर्वप्रथम बरबीघा जिला शेखपुरा एएनएम पद पर पदस्थापना के बाद सितंबर 2019 में इनका पीएचसी ठाकुरगंज में स्थानांतरण हुआ। इसके बाद कोरोना काल में फ्रंटलाइन में ठाकुरगंज में अपनी निरंतर सेवाएं देती रहीं और इस दौरान कठिन परिस्थिति में स्वास्थ्य सेवा देने के क्रम में खान – पान सही तरीके नहीं कर पा रही थी, जिस कारण कोरोनाकाल के दरमियान ही अगस्त 2020 को उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हो गया। पटना के साईं अस्पताल में डेढ़ साल की लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार नीलम ने कैंसर को मात दी और नए जीवन की शुरुआत की।
एएनएम नीलम बताती हैं कि मैं कैंसर को इसलिए मात दे पाई क्योंकि मेरे साथ मेरे पति सुधीर कुमार सिंह, पुत्र उज्जवल कुमार सुधाकर और रिश्तेदार थे।
नीलम बताती हैं कि इंसान बीमारी से एक बार और उसके खौफ से हर रोज मरता है। जब बात कैंसर की हो तो इस रोग का नाम सुनकर ही लोग जीवन का अंत समझ लेते हैं। लेकिन यह गलत है। अगर दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो इसे मात दी जा सकती है।
54 वर्ष की उम्र में स्तन कैंसर हो गया। पटना में इसकी पुष्टि हुई। फिर तो पूरा परिवार तनाव में आ गया। परिवार के लोग घबरा गए और मैंने भी यह सोच लिया कि शायद अब जान नहीं बचेगी, लेकिन अपनी इच्छा शक्ति कम नहीं होने दी। डॉक्टरों ने हिम्मत बंधाई और आज पूरी तरह स्वस्थ हूं। दवाओं का भी सहारा नहीं ले रही हूं। कैंसर जैसे रोगों को मात देने के लिए हौसला रखना जरूरी है।
