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महाभारत कथा का ऐतिहासिक कीचकवध मेला में उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब।

सारस न्यूज़, सिलीगुड़ी।

सिलीगुड़ी: महाभारत की कथा से जुड़ा ऐतिहासिक कीचकवध धार्मिक मेला का आयोजन आगामी माघी पूर्णिमा यानी रविवार, एक फरवरी को हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी किया जाएगा। भारत-नेपाल सीमा से सटे दार्जिलिंग जिले के खोरीबाड़ी प्रखंड के डांगुजोत से करीब पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित नेपाल के झापा जिले के कियाबाड़ी (पृथ्वीनगर) गांव में स्थित महाभारतकालीन कीचक वध स्थल पर पिछले सैकड़ों वर्षों से माघ माह की पूर्णिमा के दिन मेले का आयोजन होता आ रहा है।

इस संबंध में कीचक वध धाम कमेटी के अध्यक्ष शेखर थापा बताते हैं कि उक्त स्थान पर नेपाल पुरातत्व विभाग द्वारा अब तक सात चरणों में उत्खनन हो चुका है, जिसमें तबेला जैसी दिखने वाली 22 मीटर लंबी और 17 मीटर चौड़ी एक मंजिला संरचना मिली है। साथ ही मिट्टी के बर्तन, मिट्टी की ईंट जैसे प्लेट (टाइल्स), घोड़े व हाथी के गले में पहनने वाली वस्तुएं, मिसाइल के आकार के मिट्टी के सामान, पत्थर की थाली, मिट्टी की सुराही, बाण, नाग की मूर्ति एवं लोहे के चाकू आदि भी पाए गए हैं। इसके अलावा खपरैल के टुकड़े और कुछ हड्डियां मिलने की जानकारी भी मिली है। वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि नेपाल स्थित कीचक वध मेला एक ऐतिहासिक मेला है।

पातालगंगा का भी है अलग महत्व

बुजुर्गों का कहना है कि पांच दशक पहले कियाबाड़ी मेला स्थल घने जंगल में तब्दील था। साधु-संतों और ऋषि-मुनियों का यहां आना-जाना लगा रहता था। बसंत पंचमी-सरस्वती पूजा के दिन से लेकर माघ माह की पूर्णिमा तक दस दिनों तक यहां महाभारत कथा का आयोजन होता है। कीचक वध धाम कमेटी के राम कडेल ने बताया कि प्रत्येक वर्ष माघी पूर्णिमा के दिन बिहार, बंगाल, असम तथा सिक्किम से हजारों श्रद्धालु यहां माथा टेकने पहुंचते हैं। श्रद्धालु फल, फूल, बतासा, कबूतर, बकरा आदि का चढ़ावा देते हैं और मन्नतें भी मांगते हैं। वहीं मेला परिसर क्षेत्र में स्थित पातालगंगा का भी अलग महत्व है। मेले में सर्कस, झूला, बोट आदि लगाए जाते हैं।

हिन्दू रीति-रिवाज से पूजा मनाते हैं दोनों देशों के लोग

कीचक वध धाम कमेटी के सचिव बम बहादुर कोइराला ने बताया कि महाभारत काल में एक वर्ष के अज्ञातवास के दौरान मत्स्य देश के सेनापति कीचक का वध महाराज पांडु पुत्र भीम ने किया था। यहीं पांडव पुत्र भीम ने महारानी सुदेशना के भाई सेनापति कीचक को काफी लंबी लड़ाई के बाद मार गिराया था। इसी खुशी में प्रत्येक वर्ष माघ माह की पूर्णिमा के दिन कीचक वध मेला लगता है, जिसमें भारत और नेपाल के लोग मिल-जुलकर हिन्दू रीति-रिवाज से इसे मनाते हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर स्थापित मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। नेपाल की डोन्जो नदी के समीप इस स्थान पर सदियों से कीचक वध मेले का आयोजन होता आ रहा है।

कीचक ने द्रौपदी के साथ किया था दुर्व्यवहार

पुरोहित ने महाभारतकालीन घटना के संदर्भ में बताया कि 12 वर्ष के वनवास के बाद पांडवों को एक वर्ष का अज्ञातवास काटना था। वे राजा विराट के दरबार में नाम और वेश बदलकर सेवक के रूप में कार्य करने लगे। इसी दौरान राजा विराट की पत्नी महारानी सुदेशना के भाई कीचक ने द्रौपदी से दुर्व्यवहार किया, जिसका द्रौपदी ने विरोध किया। इन सारी बातों की जानकारी द्रौपदी ने अपने पति भीम को दी, जो महल में रसोइया बनकर कार्य कर रहे थे। इस मामले को लेकर भीम और कीचक के बीच मल्लयुद्ध हुआ, जिसमें लंबी लड़ाई के बाद भीम ने कीचक का वध कर दिया।

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