उच्च जोखिम वाले प्रसव का पता लगाने में मिलती है मदद
जिले में 25 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं की होती है चार बार एएनसी
प्रसवपूर्व जांच में आशा कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका
राहुल कुमार, सारस न्यूज़, किशनगंज।
मां बनना एक स्त्री के लिए उसके जीवन का सबसे सुखद अहसास होता है। गर्भधारण के साथ ही गर्भवती महिला का भ्रूण के साथ भावनात्मक संबंध बन जाता है। गर्भावस्था जहां खुशी का पल होता है, वहीं इस दौरान जच्चा-बच्चा की उचित देखभाल अत्यंत आवश्यक होती है। ऐसे में गर्भवती महिलाओं की समय-समय पर प्रसवपूर्व जांच जरूरी है। प्रसवपूर्व जांच जच्चा-बच्चा के सही स्वास्थ्य को सुनिश्चित करती है, जिससे गर्भावस्था संबंधी जोखिम और जटिलताओं से बचाव में मदद मिलती है।
प्रसवपूर्व जांच के माध्यम से उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था की पहचान कर उसका सही इलाज किया जा सकता है। प्रसवपूर्व जांच को एंटीनेटल केयर (ANC) भी कहा जाता है। गर्भावस्था के दौरान मां को होने वाली गंभीर बीमारियों का समय रहते पता लगाकर भ्रूण को उससे बचाया जा सकता है। जांच के दौरान गर्भवती में कुपोषण का भी पता चलता है, जिसके बाद उन्हें पोषक आहार संबंधी परामर्श दिया जाता है।
गर्भवती की नौ माह में चार प्रसवपूर्व जांच जरूरी: सदर अस्पताल की महिला चिकित्सा पदाधिकारी सह स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शबनम यास्मिन ने बताया कि नियमित प्रसवपूर्व जांच कराने वाली महिलाओं के बच्चे स्वस्थ होते हैं। इससे मातृ एवं शिशु मृत्यु के जोखिम में भी कमी आती है।
गर्भवती महिला को गर्भावस्था के नौ माह के दौरान चार बार प्रसवपूर्व जांच करानी चाहिए—
पहली जांच: 12 सप्ताह के भीतर या गर्भावस्था का पता चलते ही
दूसरी जांच: 14 से 26 सप्ताह के बीच
तीसरी जांच: 28 से 34 सप्ताह के बीच
चौथी जांच: 36 सप्ताह से प्रसव के समय तक
प्रसवपूर्व जांच में बीपी, हीमोग्लोबिन, वजन, लंबाई, पेशाब में शुगर और प्रोटीन की जांच सहित एचआईवी व अन्य आवश्यक जांच शामिल होती हैं। इसके साथ ही गर्भवती महिलाओं को टेटनस का टीका तथा आयरन और फॉलिक एसिड की गोलियां दी जाती हैं।
यदि महिला में खून की कमी होती है, तो उसे पोषण संबंधी सलाह और आवश्यक दवाइयां दी जाती हैं। गर्भावस्था का पता चलते ही सभी जरूरी जांच के लिए अपने क्षेत्र की आशा कार्यकर्ता से संपर्क करें। नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर एएनएम तथा चिकित्सक से परामर्श प्राप्त करें।
साथ ही गर्भावस्था के दौरान पोषण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आयरन और फॉलिक एसिड की गोलियां नियमित रूप से लेनी चाहिए। टेटनस का टीका समय पर लगवाना चाहिए और समय-समय पर डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।
25 फीसदी गर्भवती कराती हैं चार बार एएनसी: हाल में जारी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) की रिपोर्ट के अनुसार, 25 प्रतिशत महिलाओं ने अपनी गर्भावस्था के दौरान चार बार पूर्ण प्रसवपूर्व जांच कराई। जबकि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 (NFHS-4) में यह आंकड़ा केवल 12 प्रतिशत था। इस प्रकार पांच वर्षों में इसमें लगभग दोगुनी वृद्धि हुई है।
NFHS-5 के अनुसार, गर्भधारण की पहली तिमाही में प्रसवपूर्व जांच का प्रतिशत 63.2 है, जबकि NFHS-4 में यह 33 प्रतिशत था। जिले में स्वास्थ्य विभाग द्वारा प्रसवपूर्व जांच की संख्या बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। आशा और आंगनबाड़ी सेविकाओं की मदद से जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।
जरूरत इस बात की है कि यह प्रतिशत और अधिक बढ़े, ताकि अधिक से अधिक महिलाएं प्रसवपूर्व जांच कराएं और मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम किया जा सके।
प्रसवपूर्व जांच में आशा कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका: सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी ने बताया कि आशा कार्यकर्ता ग्रामीण क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं और उनके परिवारों को प्रसवपूर्व जांच के महत्व के बारे में जानकारी देती हैं। साथ ही उन्हें अस्पताल में जांच कराने के लिए प्रेरित करती हैं।
वे महिलाओं को उचित आहार, आयरन-फॉलिक एसिड की गोलियां और जरूरी टीकाकरण के बारे में जानकारी देती हैं। साथ ही समूह बनाकर स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर चर्चा भी करती हैं।
आशा कार्यकर्ताओं की मदद से प्रसवपूर्व जांच की संख्या बढ़ाने का लगातार प्रयास किया जा रहा है। NFHS-5 के अनुसार, बिहार में केवल 25 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं ने चार प्रसवपूर्व जांच कराई हैं।
सरकार की प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान और जननी सुरक्षा योजना जैसी पहलें भी इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। आशा कार्यकर्ताओं की मेहनत और सरकारी योजनाओं के संयुक्त प्रयास से प्रसवपूर्व जांच को बढ़ावा मिल रहा है।
यदि समुदाय जागरूक रहे और गर्भवती महिलाएं नियमित जांच कराएं, तो मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
उच्च जोखिम वाले प्रसव का पता लगाने में मिलती है मदद
जिले में 25 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं की होती है चार बार एएनसी
प्रसवपूर्व जांच में आशा कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका
राहुल कुमार, सारस न्यूज़, किशनगंज।
मां बनना एक स्त्री के लिए उसके जीवन का सबसे सुखद अहसास होता है। गर्भधारण के साथ ही गर्भवती महिला का भ्रूण के साथ भावनात्मक संबंध बन जाता है। गर्भावस्था जहां खुशी का पल होता है, वहीं इस दौरान जच्चा-बच्चा की उचित देखभाल अत्यंत आवश्यक होती है। ऐसे में गर्भवती महिलाओं की समय-समय पर प्रसवपूर्व जांच जरूरी है। प्रसवपूर्व जांच जच्चा-बच्चा के सही स्वास्थ्य को सुनिश्चित करती है, जिससे गर्भावस्था संबंधी जोखिम और जटिलताओं से बचाव में मदद मिलती है।
प्रसवपूर्व जांच के माध्यम से उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था की पहचान कर उसका सही इलाज किया जा सकता है। प्रसवपूर्व जांच को एंटीनेटल केयर (ANC) भी कहा जाता है। गर्भावस्था के दौरान मां को होने वाली गंभीर बीमारियों का समय रहते पता लगाकर भ्रूण को उससे बचाया जा सकता है। जांच के दौरान गर्भवती में कुपोषण का भी पता चलता है, जिसके बाद उन्हें पोषक आहार संबंधी परामर्श दिया जाता है।
गर्भवती की नौ माह में चार प्रसवपूर्व जांच जरूरी: सदर अस्पताल की महिला चिकित्सा पदाधिकारी सह स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शबनम यास्मिन ने बताया कि नियमित प्रसवपूर्व जांच कराने वाली महिलाओं के बच्चे स्वस्थ होते हैं। इससे मातृ एवं शिशु मृत्यु के जोखिम में भी कमी आती है।
गर्भवती महिला को गर्भावस्था के नौ माह के दौरान चार बार प्रसवपूर्व जांच करानी चाहिए—
पहली जांच: 12 सप्ताह के भीतर या गर्भावस्था का पता चलते ही
दूसरी जांच: 14 से 26 सप्ताह के बीच
तीसरी जांच: 28 से 34 सप्ताह के बीच
चौथी जांच: 36 सप्ताह से प्रसव के समय तक
प्रसवपूर्व जांच में बीपी, हीमोग्लोबिन, वजन, लंबाई, पेशाब में शुगर और प्रोटीन की जांच सहित एचआईवी व अन्य आवश्यक जांच शामिल होती हैं। इसके साथ ही गर्भवती महिलाओं को टेटनस का टीका तथा आयरन और फॉलिक एसिड की गोलियां दी जाती हैं।
यदि महिला में खून की कमी होती है, तो उसे पोषण संबंधी सलाह और आवश्यक दवाइयां दी जाती हैं। गर्भावस्था का पता चलते ही सभी जरूरी जांच के लिए अपने क्षेत्र की आशा कार्यकर्ता से संपर्क करें। नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर एएनएम तथा चिकित्सक से परामर्श प्राप्त करें।
साथ ही गर्भावस्था के दौरान पोषण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आयरन और फॉलिक एसिड की गोलियां नियमित रूप से लेनी चाहिए। टेटनस का टीका समय पर लगवाना चाहिए और समय-समय पर डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।
25 फीसदी गर्भवती कराती हैं चार बार एएनसी: हाल में जारी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) की रिपोर्ट के अनुसार, 25 प्रतिशत महिलाओं ने अपनी गर्भावस्था के दौरान चार बार पूर्ण प्रसवपूर्व जांच कराई। जबकि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 (NFHS-4) में यह आंकड़ा केवल 12 प्रतिशत था। इस प्रकार पांच वर्षों में इसमें लगभग दोगुनी वृद्धि हुई है।
NFHS-5 के अनुसार, गर्भधारण की पहली तिमाही में प्रसवपूर्व जांच का प्रतिशत 63.2 है, जबकि NFHS-4 में यह 33 प्रतिशत था। जिले में स्वास्थ्य विभाग द्वारा प्रसवपूर्व जांच की संख्या बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। आशा और आंगनबाड़ी सेविकाओं की मदद से जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।
जरूरत इस बात की है कि यह प्रतिशत और अधिक बढ़े, ताकि अधिक से अधिक महिलाएं प्रसवपूर्व जांच कराएं और मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम किया जा सके।
प्रसवपूर्व जांच में आशा कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका: सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी ने बताया कि आशा कार्यकर्ता ग्रामीण क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं और उनके परिवारों को प्रसवपूर्व जांच के महत्व के बारे में जानकारी देती हैं। साथ ही उन्हें अस्पताल में जांच कराने के लिए प्रेरित करती हैं।
वे महिलाओं को उचित आहार, आयरन-फॉलिक एसिड की गोलियां और जरूरी टीकाकरण के बारे में जानकारी देती हैं। साथ ही समूह बनाकर स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर चर्चा भी करती हैं।
आशा कार्यकर्ताओं की मदद से प्रसवपूर्व जांच की संख्या बढ़ाने का लगातार प्रयास किया जा रहा है। NFHS-5 के अनुसार, बिहार में केवल 25 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं ने चार प्रसवपूर्व जांच कराई हैं।
सरकार की प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान और जननी सुरक्षा योजना जैसी पहलें भी इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। आशा कार्यकर्ताओं की मेहनत और सरकारी योजनाओं के संयुक्त प्रयास से प्रसवपूर्व जांच को बढ़ावा मिल रहा है।
यदि समुदाय जागरूक रहे और गर्भवती महिलाएं नियमित जांच कराएं, तो मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।